अठारह साल बाद भी नहीं टूटी माट्साब की उम्मीद
मास्टरी गये
अठारह साल गुजर गये, लेकिन माट्साब की उम्मीद नहीं टूटी है। माट्साब अभी भी लगे हैं। यह सोच कर कि शायद, गंगा उलटी दिशा में बह चले।
माट्साब की कहानी शुरू होती है वर्ष 2006 में। तब, राज्य सरकार ने विश्वविद्यालयों से इंटरमीडिएट की पढ़ाई अलग करने का फैसला लिया था। इसकी शुरुआत पटना विश्वविद्यालय से हुई। विकल्प के रूप में राजधानी में माध्यमिक विद्यालयों को उच्च माध्यमिक विद्यालय के रूप में अपग्रेड किया गया। जिन स्कूलों में पहले से इंटरमीडिएट की पढ़ाई चल रही थी, उनमें से कई में नये संकाय भी शुरू किये गये। इस पर तत्काल अमल शुरू हो गया। लेकिन, समस्या सामने आयी कि नियोजित शिक्षकों की नियुक्ति होने तक बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी? इस समस्या के निराकरण के लिए माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने 14 जून, 2006 को एक निर्देश जारी किया। इसके तहत नियोजन
इकाइयों द्वारा शिक्षकों की नियुक्ति किये जाने तक 150 रुपये दैनिक पारिश्रमिक पर शिक्षक रखे जाने थे। उसी आदेश के तहत स्थानीय शहीद राजेंद्र प्रसाद सिंह राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय (पटना हाई स्कूल) में भी इंटरमीडिएट के शिक्षक विहीन विषयों में 150 रुपये दैनिक पारिश्रमिक पर शिक्षक रखे गये। उन्हीं में एक हैं पुरानी जक्कनपुर के तरूण कुमार। वाणिज्य में स्नातकोत्तर एवं बीएड योग्यताधारी श्री कुमार उस विद्यालय के पूर्ववर्ती छात्र भी हैं। उनसे 150 रुपये के दैनिक पारिश्रमिक पर 19 जुलाई, 2006 से वाणिज्य विषय में शिक्षण कार्य लिया जाने लगा। जब पटना नगर निगम नियोजन इकाई द्वारा उस विद्यालय में शिक्षक विहीन विषयों में शिक्षकों की नियुक्ति हो गयी, तो दैनिक पारिश्रमिक पर काम करने वाले दूसरे शिक्षकों की तरह तरूण कुमार से भी शिक्षण कार्य लिया जाना बंद हो गया। श्री कुमार ने 19 फरवरी, 2007 तक 150 रुपये के दैनिक पारिश्रमिक पर
शिक्षण कार्य किया। शिक्षण कार्य से मुक्त किये गये दैनिक पारिश्रमिक वाले दूसरे शिक्षक विभिन्न नियोजन इकाइयों की नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल हो गये। पर, श्री कुमार ने शिक्षक पद पर नियुक्ति के लिए नियोजन इकाइयों में आवेदन तक देने से इन्कार कर दिया। इस तर्क पर कि चूंकि, वे दिव्यांग हैं, इसीलिए दिव्यांगता के आधार पर उनकी सेवा शहीद राजेंद्र प्रसाद सिंह राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में ही नियमित की जाय। इसके लिए वे ज्ञापन के जरिये माध्यमिक शिक्षा निदेशक से लेकर राष्ट्रपति भवन तक के दरवाजे खटखटा चुके हैं। उनके द्वारा अब तक ज्ञापन के माध्यम से जिन लोगों के दरवाजे खटखटाये जा चुके हैं, उनमें माध्यमिक शिक्षा निदेशक, शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव, मुख्य सचिव, उपमुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय कल्याण मंत्री एवं राष्ट्रपति खास तौर शामिल हैं। बहरहाल, श्री कुमार अब तक अपनी बात पर कायम हैं।
