बिहार में शिक्षकों से संपत्ति ब्योरा लेना बना भ्रष्टाचार का नया रास्ता

 बिहार में शिक्षकों से संपत्ति ब्योरा लेना बना भ्रष्टाचार का नया रास्ता



बिहार में पारदर्शिता के नाम पर शिक्षकों से संपत्ति का ब्योरा मांगा जा रहा है, लेकिन अब यही प्रक्रिया सवालों के घेरे में है। कुछ लोग नियम के बहाने उन्हें बार-बार परेशान किया जा रहा है और कहीं-कहीं यह व्यवस्था कुछ लोगों के लिए कमाई का जरिया बनती दिख रही है। क्या वाकई यह कदम ईमानदारी सुनिश्चित करने के लिए है, या इसके पीछे कोई और खेल चल रहा है यही सवाल अब जोर पकड़ रहा है।

समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर प्रखंड शिक्षा विभाग ने जिला कार्यक्रम पदाधिकारी माध्यमिक शिक्षा एवं साक्षरता प्रेम शंकर झा के पत्र को कमाई का जरिया बनाया है।

उक्त पत्र के आलोक में शिक्षकों को संपत्ति का ब्यौरा उपलब्ध कराना है। जिसमें कहा गया है कि बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 (समय समय पर यथा संशोधित) के नियम 19 (1, 2, 3 एवं 8) में स्पष्ट अंकित है कि किसी भी सरकारी सेवक को प्रथम नियुक्ति के समय और उसके बाद 12 माह के अंतराल पर अपनी चल, अचल एवं मूल्यवान संपत्ति का ब्योरा कार्यालय को उपलब्ध कराना है।

पत्र में यह भी कहा गया है कि सभी प्रधानाध्यापक/प्रभारी प्रधानाध्यापक अपने क्षेत्राधीन सभी शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मी का चल, अचल एवं मूल्यवान संपत्ति का ब्योरा विहित प्रपत्र में प्रखंड संसाधन केन्द्र कार्यालय को उपलब्ध कराना सुनिश्चित करेंगे।

माह जनवरी का भुगतान तदनरूप किए जाने की बातें भी कही गई है। पत्र में यह कहीं वर्णित नहीं है कि ब्योरा जमा करने के लिए प्रखंड शिक्षा विभाग कार्यालय में व्यवस्था की गई है।

साथ हीं उक्त कार्य के एवज में शिक्षकों को एक-एक सौ रुपए भुगतान करने होंगे। विभागीय कार्रवाई के डर से नाम नहीं छापने की शर्त पर शिक्षक/शिक्षिकाएं कहते हैं कि शिक्षा विभाग की कारगुजारी ऐसी कि उक्त कार्य के बहाने अपने स्तर से दो आपरेटर रखकर उगाही करने का खेल चल रहा है। उनके द्वारा शिक्षकों को सहूलियत देने का भरोसा दिया जा रहा है। जबकि, ये काम किसी भी वसुधा केन्द्र या आनलाइन वाले दुकान से संभव है।

क्या कहते हैं आंकड़े 

लेखा सहायक योगेश कुमार की मानें तो विभूतिपुर प्रखंड के अंदर 119 प्राथमिक विद्यालय, 72 मध्य विद्यालय और 31 माध्यमिक/प्लस टू समेत कुल 222 सरकारी विद्यालय हैं। जिसमें कुल 2157 शिक्षक/शिक्षिकाएं कार्यरत हैं। लोगों के बीच इस बात की चर्चा सरेआम है कि ऐसी संख्या में शिक्षकों से उगाही की राशि समझी जा सकती है। कार्य निष्पादन के लिए भले कार्टेज और पेपर के खर्च हो रहे हों। उगाही की रकम आकलन कर शिक्षकों का एक प्रतिनिधिमंडल जिला शिक्षा पदाधिकारी से मिलकर मामले से अवगत कराने की बातें कही है।

एक छोटे से कार्य के इतने अवैध शुल्क

उगाही का कारण एक निश्चित एमबी में फाइल सबमिट करना बताया गया है। शिक्षक/शिक्षिकाएं कहते हैं कि संपत्ति का ब्योरा जमा करने से संबंधित कागजातों के साथ किसी भी आनलाइन सुविधा वाले दुकान या वसुधा केन्द्र से आवेदन करने हैं। संबंधित कागजातों का पीडीएफ एक निश्चित आकार के एमबी में शिक्षा विभाग कार्यालय को प्राप्त कराने हैं। इतने से अवसर को भुनाने के लिए प्रखंड शिक्षा विभाग ने प्रत्येक शिक्षक/शिक्षिका से 100 रुपए का शुल्क तहसीली कर रही। लेखा सहायक ने भी वाटसएप ग्रुप पर ब्योरा जमा करने संबंधी मैसेज डाला है।

लेन-देन के बीच दो आपरेटर के नाम के चर्चे 

प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय में कार्यरत दो डाटा इंट्री आपरेटर प्रशांत कुमार और विशाल कुमार का नाम संपत्ति ब्यौरा जमा करने का कार्य देख रहे। इनके पास अब तक तकरीबन 100 शिक्षक-शिक्षिकाएं कार्य वास्ते कागजात दे चुके। ये शिक्षक बस दबे स्वर इस बात की चर्चा कर रहे कि वसुधा केन्द्र से तीगुने कीमत विभाग के अंदर चुकाने पर रहे। अगर, कोई इसके खिलाफ आवाज उठाए तो कार्रवाई का धौंस जुबान सिलकर रखने को मजबूर कर रहा।
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